धीरज धरम मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥
dhīraja dharama mitra aru nārī | āpada kāla parikhi-ahiṁ chārī ||
धैर्य, धर्म, सच्चा मित्र और जीवनसंगिनी — इन चारों की वास्तविक परीक्षा विपत्ति और संकट के समय ही होती है।
"Vasudhaiva Kutumbakam: Sacrificial Bonds of Family, Brotherhood and Loyal Friends"
Human life achieves emotional fulfillment through righteous bonds of kinship and loyal companionship. The Valmiki Ramayana stands as the supreme monument to filial duty, maternal reverence ("Janani Janmabhoomischa Swargadapi Gariyasi"), and selfless brotherhood (Lakshmana and Bharata). In the Mahabharata, the sacred friendships between Krishna and Sudama, and Krishna and Arjuna, define unconditional loyalty. These shlokas illuminate how to navigate relationship friction, cultivate mutual respect across generations, forgive human frailties, and build families anchored in enduring Vedic values.
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धीरज धरम मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥
dhīraja dharama mitra aru nārī | āpada kāla parikhi-ahiṁ chārī ||
धैर्य, धर्म, सच्चा मित्र और जीवनसंगिनी — इन चारों की वास्तविक परीक्षा विपत्ति और संकट के समय ही होती है।
सत्यस्य वचनं साधु सत्यादपि हितं वदेत्। यद्भूतहितमत्यन्तमेतत् सत्यं मतं मम॥
satyasya vacanaṁ sādhu satyād api hitaṁ vadet | yad-bhūta-hitam atyantam etat satyaṁ mataṁ mama ||
सत्य बोलना श्रेष्ठ है, किन्तु सत्य से भी बढ़कर वह वचन बोलना चाहिए जो समस्त प्राणियों का हित करे। जो वचन सबका परम कल्याण करने वाला हो, वही मेरे मत में वास्तविक सत्य है।
न भीतो मरणादस्मि केवलं दूषितो यशः। यच्च मे कीर्तयेत् कश्चित् तन्मे मरणतोऽधिकम्॥
na bhīto maraṇād asmi kevalaṁ dūṣito yaśaḥ | yac-ca me kīrtayet kaścit tan-me maraṇato 'dhikam ||
मुझे मृत्यु का कोई भय नहीं है; मुझे केवल अपने यश और चरित्र पर कलंक लगने का भय है। क्योंकि स्वाभिमानी पुरुष के लिए अपयश मृत्यु से भी अधिक कष्टकारी होता है।
श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥
śreyān sva-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣṭhitāt | sva-dharme nidhanaṁ śreyaḥ para-dharmo bhayāvahaḥ ||
दूसरों के कर्तव्य को भली-भाँति आचरण करने की अपेक्षा अपनी स्वाभाविक प्रतिभा और स्वधर्म का पालन करना कहीं अधिक कल्याणकारी है। अपने स्वाभाविक कर्तव्य में तो मृत्यु भी श्रेयस्कर है, दूसरों का मार्ग भय देने वाला है।
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥
karpūra-gauraṁ karuṇā-vatāraṁ saṁsāra-sāraṁ bhujagendra-hāram | sadā vasantaṁ hṛdayāravinde bhavaṁ bhavānī-sahitaṁ namāmi ||
जो कर्पूर के समान श्वेत वर्ण और करुणा के साक्षात् अवतार हैं, जो इस सम्पूर्ण संसार का मूल तत्व (सार) हैं और सर्पों का हार धारण करते हैं; जो भक्तों के हृदय-कमल में सदा निवास करते हैं, उन भगवान भव (शिव) को माता भवानी (पार्वती) सहित मैं नमन करता हूँ।
अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं दमः। अहिंसा परमं दानमहिंसा परमं तपः॥
ahiṁsā paramo dharmas tathāhiṁsā paraṁ damaḥ | ahiṁsā paramaṁ dānam ahiṁsā paramaṁ tapaḥ ||
अहिंसा ही परम धर्म है, अहिंसा ही परम आत्मनियंत्रण है, अहिंसा ही सबसे बड़ा दान है और अहिंसा ही सर्वोच्च तपस्या है।
न हि वैरेण वैराणि शाम्यन्तीह कदाचन। अवैरेण च शाम्यन्ति एष धर्मः सनातनः॥
na hi vaireṇa vairāṇi śāmyantīha kadācana | avaireṇa ca śāmyanti eṣa dharmaḥ sanātanaḥ ||
इस संसार में शत्रुता से शत्रुता कभी शांत नहीं होती; प्रेम, सद्भाव और वैरहीनता से ही वैर का शमन होता है। यही शाश्वत सनातन धर्म है।
उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
uddhared ātmanā''tmānaṁ nātmānam avasādayet | ātmaiva hy-ātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ ||
मनुष्य को चाहिए कि वह अपने मन द्वारा अपना उद्धार करे, अपने आपको नीचे न गिराए। क्योंकि यह मनुष्य स्वयं ही अपना सच्चा मित्र है और स्वयं ही अपना सबसे बड़ा शत्रु है।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥
uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet | ātmaiva hy ātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ ||
मनुष्य को अपने मन के द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए, स्वयं को अधोगति में नहीं गिरने देना चाहिए। क्योंकि मनुष्य का अपना ही मन उसका परम मित्र है और वही उसका घोर शत्रु भी है।
एकः क्षमावतां दोषो द्वितीयो नोपपद्यते। यदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्यते जनः॥
ekaḥ kṣamāvatāṁ doṣo dvitīyo nopapadyate | yad enaṁ kṣamayā yuktam aśaktaṁ manyate janaḥ ||
क्षमावान व्यक्तियों में केवल एक ही दोष देखा जाता है, दूसरा कोई नहीं—और वह दोष यह है कि अज्ञानी लोग उनके क्षमाभाव को उनकी निर्बलता समझ लेते हैं।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
yadā yadā hi dharmasya glānir bhavati bhārata | abhyutthānam adharmasya tadātmānaṁ sṛjāmy-aham ||
हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ (अवतार धारण करता हूँ)।
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥
manojavaṁ māruta-tulya-vegaṁ jitendriyaṁ buddhimatāṁ variṣṭham | vātātmajaṁ vānara-yūtha-mukhyaṁ śrīrāma-dūtaṁ śaraṇaṁ prapadye ||
जिनकी गति मन के समान और वेग वायु के समान तीव्र है, जिन्होंने अपनी समस्त इंद्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली है, जो बुद्धिमानों में सर्वश्रेष्ठ हैं; जो पवन-पुत्र और वानर सेना के अग्रगण्य हैं, उन परम प्रभु श्रीराम के दूत श्रीहनुमान जी की मैं शरण लेता हूँ।
रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः। राजा सर्वस्य लोकस्य देवानां मघवानिव॥
rāmo vigrahavān dharmaḥ sādhuḥ satya-parākramaḥ | rājā sarvasya lokasya devānāṁ maghavān iva ||
श्रीराम साक्षात् धर्म के मूर्त स्वरूप हैं। वे परम साधु और सत्यवादी पराक्रमी हैं। वे सम्पूर्ण लोकों के वैसे ही रक्षक और स्वामी हैं जैसे देवताओं के देवराज इन्द्र हैं।
सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥ भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्र के काज संवारे॥
sūkṣma rūpa dhari siyahiṁ dikhāvā | bikaṭa rūpa dhari laṅka jarāvā || bhīma rūpa dhari asura saṁhāre | rāmacandra ke kāja saṁvāre ||
माता सीता के समक्ष आप अत्यंत विनीत सूक्ष्म रूप में प्रकट हुए, लंका में अहंकारी रावण के समक्ष विकराल रूप धारण कर लंका को भस्म किया, और युद्ध में विशाल भीम रूप धारण कर दुष्टों का संहार कर श्रीराम के समस्त कार्यों को सिद्ध किया।
कालो हि सर्वभूतानां विधाता परमो मतः। न कालमतिवर्तन्ते प्राणिनां सुखदुःखे॥
kālo hi sarva-bhūtānāṁ vidhātā paramo mataḥ | na kālam ativartante prāṇināṁ sukha-duḥkhe ||
समय ही समस्त प्राणियों का परम विधाता और नियंत्रक है। किसी भी प्राणी के सुख अथवा दुःख समय के अटल चक्र को कभी लांघ नहीं सकते।
मानं हित्वा प्रियो भवति क्रोधं हित्वा न शोचति। कामं हित्वाऽर्थवान् भवति लोभं हित्वा सुखी भवेत्॥
mānaṁ hitvā priyo bhavati krodhaṁ hitvā na śocati | kāmaṁ hitvā'rthavān bhavati lobhaṁ hitvā sukhī bhavet ||
अहंकार को त्यागने से व्यक्ति सबका प्रिय बन जाता है, क्रोध त्यागने से कभी शोक नहीं होता, अनियंत्रित कामना त्यागने से मनुष्य यथार्थ में समृद्ध होता है और लोभ त्यागने से व्यक्ति सुखी होता है।
उत्साहो बलवान् आर्य नास्त्युत्साहात् परं बलम्। सोत्साहस्य हि लोकेषु न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥
utsāho balavān ārya nāsty-utsāhāt paraṁ balam | sotsāhasya hi lokeṣu na kiñcid api durlabham ||
हे आर्य! उत्साह ही संसार का सबसे बड़ा बल है; उत्साह से बढ़कर कोई शक्ति नहीं होती। जिस व्यक्ति के हृदय में अदम्य उत्साह है, उसके लिए इस त्रिभुवन में कुछ भी दुर्लभ नहीं है।
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥
sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śaraṇaṁ vraja | ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo mokṣayiṣyāmi mā śucaḥ ||
सभी औपचारिक धर्मों और संशयों को छोड़कर केवल मेरी अनन्य शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें समस्त बंधनों और दुखों से मुक्त कर दूँगा; तुम शोक मत करो।
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्यchainsोर्मुक्षीय मामृतात्॥
oṁ try-ambakaṁ yajāmahe sugandhiṁ puṣṭi-vardhanam | urvārukam iva bandhanān mṛtyor mukṣīya māmṛtāt ||
हम त्रिनेत्रधारी भगवान शिव की आराधना करते हैं, जो सुगन्धित हैं और समस्त जीवों का पोषण करने वाले हैं। जिस प्रकार पका हुआ खरबूजा बेल के बंधन से अनायास मुक्त हो जाता है, उसी प्रकार हम भी मृत्यु और संसार के बंधनों से मुक्त हों, पर अमृतत्व (परमपद) से कभी विलग न हों।
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
atulita-bala-dhāmaṁ hema-śailābha-dehaṁ danuja-vana-kṛśānuṁ jñāninām agra-gaṇyam | sakala-guṇa-nidhānaṁ vānarāṇām adhīśaṁ raghupati-priya-bhaktaṁ vātajātaṁ namāmi ||
जो अतुल्य बल के धाम हैं, जिनका सुवर्ण पर्वत (सुमेरु) के समान कांतिमान देह है, जो दुष्ट राक्षसों रूपी वन के लिए प्रलयंकारी अग्नि हैं, जो ज्ञानियों में सबसे आगे गिने जाते हैं; जो समस्त सद्गुणों के भंडार हैं और भगवान श्रीराम के परम प्रिय भक्त हैं, उन पवन-पुत्र हनुमान को मैं नमन करता हूँ।
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥
nainaṁ chindanti śastrāṇi nainaṁ dahati pāvakaḥ | na cainaṁ kledayanty āpo na śoṣayati mārutaḥ ||
इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि इसे जला नहीं सकती, जल इसे भिगो नहीं सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती। यह अविनाशी और नित्य है।
शान्तं पद्मासनस्थं शशधरमुकुटं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रं शूलं वज्रं च खड्गं परशुमभयदं दक्षिणाङ्गे वहन्तम्। नागं पाशं च घण्टां डमरुकसहितां चाङ्कुशं वामभागे सर्वालङ्कारयुक्तं प्रणमत सततं चन्द्रचूडं भवानीम्॥
śāntaṁ padmāsanasthaṁ śaśadhara-mukuṭaṁ pañca-vaktraṁ trinetraṁ śūlaṁ vajraṁ ca khaḍgaṁ paraśum-abhayadaṁ dakṣiṇāṅge vahantam | nāgaṁ pāśaṁ ca ghaṇṭāṁ ḍamaruka-sahitāṁ cāṅkuśaṁ vāma-bhāge sarvālaṅkāra-yuktaṁ praṇamata satataṁ candracūḍaṁ bhavānīm ||
जो परम शांत, पद्मासन पर स्थित, चन्द्रमा का मुकुट धारण करने वाले, पंचमुख और त्रिनेत्र हैं; जो अपने दाहिने हाथों में शूल, वज्र, खड्ग, परशु और अभयमुद्रा धारण करते हैं और बाएँ हाथों में नाग, पाश, घण्टा, डमरू तथा अंकुश धारण करते हैं — उन चन्द्रशेखर भगवान शिव को सतत प्रणाम करें।
भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥ नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥
bhūta pisāca nikaṭa nahiṁ āvai | mahābīra jaba nāma sunāvai || nāsai roga harai saba pīrā | japata nirantara hanumata bīrā ||
महावीर हनुमान का नाम स्मरण करने मात्र से नकारात्मक शक्तियां, भ्रम और भय निकट नहीं आते। महावीर का निरंतर ध्यान करने से समस्त शारीरिक व मानसिक रोग और पीड़ाएं नष्ट हो जाती हैं।
जिन्ह के कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह के हृदय बसहु रघुराया॥
jinha ke kapaṭa dambha nahiṁ māyā | tinha ke hṛdaya basahu raghurāyā ||
जिनके हृदय में कोई कपट, पाखंड और छल-प्रपंच नहीं होता, साक्षात् रघुपति श्रीराम केवल उन्हीं के निष्कपट हृदय में वास करते हैं।
प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानघन। जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥
praṇava-uṁ pavana-kumāra khala bana pāvaka gyāna-ghana | jāsu hṛdaya āgāra basahiṁ rāma sara cāpa dhara ||
मैं पवन-पुत्र हनुमान जी को प्रणाम करता हूँ, जो दुष्टों रूपी वन के लिए अग्नि समान हैं, जो ज्ञान के अगाध मेघ (घन) हैं, और जिनके हृदय रूपी मंदिर में धनुष-बाण धारण किए साक्षात् भगवान श्रीराम सदा निवास करते हैं।
धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात्प्रभवते सुखम्। धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत्॥
dharmād arthaḥ prabhavati dharmāt prabhavate sukham | dharmeṇa labhate sarvaṁ dharma-sāram idaṁ jagat ||
धर्म (सत्य और न्यायपूर्ण आचरण) से ही स्थायी समृद्धि और वास्तविक सुख उत्पन्न होता है। धर्म से ही व्यक्ति सब कुछ प्राप्त करता है; यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड धर्म पर ही टिका है।
सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः। अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः॥
sulabhāḥ puruṣā rājan satataṁ priya-vādinaḥ | apriyasya tu pathyasya vaktā śrotā ca durlabhaḥ ||
हे राजन! मीठा बोलने वाले और चापलूसी करने वाले लोग तो सरलता से मिल जाते हैं, किन्तु जो सुनने में अप्रिय लगे परन्तु वास्तव में हितकारी हो, ऐसे वचन बोलने वाले और सुनने वाले दोनों ही अत्यंत दुर्लभ हैं।
यतो धर्मस्ततो जयः।
yato dharmas tato jayaḥ |
जहाँ धर्म (सत्य, न्याय और कर्तव्यपरायणता) है, विजय भी निश्चित रूप से वहीं होती है।
Practical explanations from critical edition commentaries and ancient acharyas.
Valmiki Ramayana Yuddha Kanda: "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" — Mother and motherland are far superior and more sacred than even heaven itself.
वाल्मीकि रामायण का यह अमर उद्घोष "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" सिखाता है कि माँ और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी बढ़कर है।
A true friend restrains you from harmful vices, guides you toward righteous actions, guards your confidences, and stands unwaveringly beside you in times of adversity.
सच्चा मित्र वह है जो बुराई से रोके, भलाई के मार्ग पर लगाए, गुप्त बातों को सुरक्षित रखे और विपत्ति के समय साथ कभी न छोड़े।
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