MAHABHARATA DAILY ARCHIVE

दैनिक ज्ञान अभिलेखागार (संग्रह)

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1 Sep 2026

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए कर्म के फल के आकांक्षी मत बनो और न ही अकर्मण्यता (कर्म न करने) में तुम्हारी आसक्ति हो।

— भगवान श्रीकृष्ण (Shri Krishna)श्रीमद्भगवद्गीता २.४७
कर्मयोग
2 Sep 2026

यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं परे। कृतमेवास्य जानन्ति स वै पण्डित उच्यते॥

जिस व्यक्ति के विचार, योजनाएं और निर्णय कार्य पूर्ण होने से पहले दूसरों को ज्ञात नहीं होते, केवल कार्य संपन्न होने पर ही प्रकट होते हैं, वही वास्तव में बुद्धिमान और नीतिज्ञ है।

— महात्मा विदुर (Mahatma Vidura)विदुर नीति ३३.१७
विदुर नीति
3 Sep 2026

धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात्प्रभवते सुखम्। धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत्॥

धर्म (सत्य और न्यायपूर्ण आचरण) से ही स्थायी समृद्धि और वास्तविक सुख उत्पन्न होता है। धर्म से ही व्यक्ति सब कुछ प्राप्त करता है; यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड धर्म पर ही टिका है।

— भीष्म पितामह (Bhishma Pitamaha)शान्ति पर्व १२३.१२
धर्म
4 Sep 2026

षड् दोषाः पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता। निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता॥

उन्नति और ऐश्वर्य चाहने वाले मनुष्य को छह दुर्गुणों का पूर्ण परित्याग कर देना चाहिए: अत्यधिक नींद, तंद्रा (सुस्ती), भय, क्रोध, आलस्य और काम टालने की आदत (दीर्घसूत्रता)।

— महात्मा विदुर (Mahatma Vidura)विदुर नीति ३३.६६
आत्मजय
5 Sep 2026

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

मनुष्य को अपने मन के द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए, स्वयं को अधोगति में नहीं गिरने देना चाहिए। क्योंकि मनुष्य का अपना ही मन उसका परम मित्र है और वही उसका घोर शत्रु भी है।

— भगवान श्रीकृष्ण (Shri Krishna)श्रीमद्भगवद्गीता ६.५
आत्मसंयम
6 Sep 2026

मानं हित्वा प्रियो भवति क्रोधं हित्वा न शोचति। कामं हित्वाऽर्थवान् भवति लोभं हित्वा सुखी भवेत्॥

अहंकार को त्यागने से व्यक्ति सबका प्रिय बन जाता है, क्रोध त्यागने से कभी शोक नहीं होता, अनियंत्रित कामना त्यागने से मनुष्य यथार्थ में समृद्ध होता है और लोभ त्यागने से व्यक्ति सुखी होता है।

— धर्मराज युधिष्ठिर (Yudhishthira)यक्ष प्रश्न ३१३.८९
यक्ष प्रश्न
7 Sep 2026

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥

नष्ट किया हुआ धर्म मारने वाले का विनाश कर देता है, और रक्षा किया हुआ धर्म रक्षक की रक्षा करता है। इसलिए धर्म का हनन कभी नहीं करना चाहिए, जिससे नष्ट धर्म हमारा विनाश न करे।

— महर्षि वेदव्यास (Maharshi Veda Vyasa)महाभारत वनपर्व / मनुस्मृति ८.१५
धर्म रक्षा
8 Sep 2026

सूतो वा सूतपुत्रो वा यो वा को वा भवाम्यहम्। दैवायत्तं कुले जन्म मदायत्तं तु पौरुषम्॥

मैं सूत हूँ या सूतपुत्र, अथवा कोई भी अन्य कुल में जन्मा हूँ। किसी कुल में जन्म लेना विधाता के अधीन है, किन्तु पराक्रम, पौरुष और पुरुषार्थ पूर्णतः मेरे अपने हाथों में है!

— दानवीर कर्ण (Danaveer Karna)वेणीसंहार / आदिपर्व प्रसंग
पौरुष
9 Sep 2026

अक्रोधेन जयेत् क्रोधमसाधुं साधुना जयेत्। जयेत् कदर्यं दानेन जयेत् सत्येन चानृतम्॥

क्रोध को शांति (अक्रोध) से जीतें, दुष्टता को भलाई से जीतें। कंजूस को दान से जीतें और असत्य को अटल सत्य से जीतें।

— महात्मा विदुर (Mahatma Vidura)विदुर नीति ३९.७३
सत्य विजय
10 Sep 2026

सुलभाः पुरुषा राजन् सततं प्रियवादिनः। अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभः॥

हे राजन! मीठा बोलने वाले और चापलूसी करने वाले लोग तो सरलता से मिल जाते हैं, किन्तु जो सुनने में अप्रिय लगे परन्तु वास्तव में हितकारी हो, ऐसे वचन बोलने वाले और सुनने वाले दोनों ही अत्यंत दुर्लभ हैं।

— महात्मा विदुर (Mahatma Vidura)विदुर नीति ३७.१५
हितोपदेश
11 Sep 2026

न जातु कामान्न भयान्न लोभाद्धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः। नित्यो धर्मः सुखदुःखे त्वनित्ये जीवो नित्यो हेतुरस्य त्वनित्यः॥

कामना, भय या लोभ के वशीभूत होकर, यहाँ तक कि प्राणों की रक्षा के लिए भी धर्म (सत्य और कर्तव्य) का त्याग कभी न करें। क्योंकि धर्म नित्य (शाश्वत) है, सुख-दुःख अनित्य हैं; आत्मा नित्य है, और उसका कारण अनित्य है।

— महर्षि वेदव्यास (Maharshi Veda Vyasa)भारत सावित्री ५.५०
भारत सावित्री
12 Sep 2026

अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्। शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम्॥

प्रतिदिन अनगिनत प्राणी यमलोक (मृत्यु) की ओर प्रस्थान करते हैं, फिर भी जो जीवित बचे हैं वे स्वयं को इस संसार में सदैव अमर रहने वाला मानते हैं। इससे बड़ा आश्चर्य इस संसार में और क्या हो सकता है!

— धर्मराज युधिष्ठिर (Yudhishthira)यक्ष प्रश्न ३१३.११६
यक्ष प्रश्न
13 Sep 2026

क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

क्रोध से विवेकहीनता (संमोह) उत्पन्न होती है, विवेकहीनता से स्मृति का भ्रम होता है, स्मृति-भ्रम से बुद्धि (निर्णय क्षमता) का नाश होता है और बुद्धि नष्ट होने पर मनुष्य का सर्वनाश हो जाता है।

— भगवान श्रीकृष्ण (Shri Krishna)श्रीमद्भगवद्गीता २.६३
क्रोध शमन
14 Sep 2026

अहिंसा परमो धर्मस्तथाहिंसा परं दमः। अहिंसा परमं दानमहिंसा परमं तपः॥

अहिंसा ही परम धर्म है, अहिंसा ही परम आत्मनियंत्रण है, अहिंसा ही सबसे बड़ा दान है और अहिंसा ही सर्वोच्च तपस्या है।

— भीष्म पितामह (Bhishma Pitamaha)अनुशासन पर्व ११५.२५
अहिंसा
15 Sep 2026

यतो धर्मस्ततो जयः।

जहाँ धर्म (सत्य, न्याय और कर्तव्यपरायणता) है, विजय भी निश्चित रूप से वहीं होती है।

— माता गान्धारी एवं वेदव्यास (Mata Gandhari & Vyasa)स्त्रीपर्व / उद्योगपर्व घोषवाक्य
सत्यमेव जयते
16 Sep 2026

सत्यस्य वचनं साधु सत्यादपि हितं वदेत्। यद्भूतहितमत्यन्तमेतत् सत्यं मतं मम॥

सत्य बोलना श्रेष्ठ है, किन्तु सत्य से भी बढ़कर वह वचन बोलना चाहिए जो समस्त प्राणियों का हित करे। जो वचन सबका परम कल्याण करने वाला हो, वही मेरे मत में वास्तविक सत्य है।

— भीष्म पितामह (Bhishma Pitamaha)शान्ति पर्व ३२९.१३
सत्य और कल्याण
17 Sep 2026

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥

दूसरों के कर्तव्य को भली-भाँति आचरण करने की अपेक्षा अपनी स्वाभाविक प्रतिभा और स्वधर्म का पालन करना कहीं अधिक कल्याणकारी है। अपने स्वाभाविक कर्तव्य में तो मृत्यु भी श्रेयस्कर है, दूसरों का मार्ग भय देने वाला है।

— भगवान श्रीकृष्ण (Shri Krishna)श्रीमद्भगवद्गीता ३.३५
स्वधर्म
18 Sep 2026

एकः क्षमावतां दोषो द्वितीयो नोपपद्यते। यदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्यते जनः॥

क्षमावान व्यक्तियों में केवल एक ही दोष देखा जाता है, दूसरा कोई नहीं—और वह दोष यह है कि अज्ञानी लोग उनके क्षमाभाव को उनकी निर्बलता समझ लेते हैं।

— महात्मा विदुर (Mahatma Vidura)विदुर नीति ३३.४८
क्षमा
19 Sep 2026

कालो हि सर्वभूतानां विधाता परमो मतः। न कालमतिवर्तन्ते प्राणिनां सुखदुःखे॥

समय ही समस्त प्राणियों का परम विधाता और नियंत्रक है। किसी भी प्राणी के सुख अथवा दुःख समय के अटल चक्र को कभी लांघ नहीं सकते।

— भीष्म पितामह (Bhishma Pitamaha)शान्ति पर्व २२४.१६
कालचक्र
20 Sep 2026

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

हे धनंजय (अर्जुन)! आसक्ति को त्यागकर तथा सफलता और असफलता में समान भाव रखकर योग में स्थित होकर कर्म करो; यह समत्व (संतुलन) ही वास्तव में योग कहलाता है।

— भगवान श्रीकृष्ण (Shri Krishna)श्रीमद्भगवद्गीता २.४८
समत्व योग
21 Sep 2026

न हि वैरेण वैराणि शाम्यन्तीह कदाचन। अवैरेण च शाम्यन्ति एष धर्मः सनातनः॥

इस संसार में शत्रुता से शत्रुता कभी शांत नहीं होती; प्रेम, सद्भाव और वैरहीनता से ही वैर का शमन होता है। यही शाश्वत सनातन धर्म है।

— महात्मा विदुर एवं सनत्सुजात (Vidura & Sanatsujata)उद्योग पर्व / सनत्सुजात पर्व
सद्भाव
22 Sep 2026

द्वौ इमौ ग्रसते भूमिः सर्पो बिलशयानिव। राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम्॥

जिस प्रकार बिल में रहने वाले जीवों को सर्प निगल जाता है, उसी प्रकार यह भूमि दो प्रकार के व्यक्तियों को लील जाती है: अन्याय का विरोध न करने वाले राजा (नेता) को और ज्ञान की खोज में घर न छोड़ने वाले विद्वान को।

— महात्मा विदुर (Mahatma Vidura)विदुर नीति ३३.४३
राजधर्म
23 Sep 2026

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥

इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि इसे जला नहीं सकती, जल इसे भिगो नहीं सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती। यह अविनाशी और नित्य है।

— भगवान श्रीकृष्ण (Shri Krishna)श्रीमद्भगवद्गीता २.२३
आत्मज्ञान
24 Sep 2026

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ। सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनर्स्थापना के लिए मैं प्रत्येक युग में अवतरित होता हूँ।

— भगवान श्रीकृष्ण (Shri Krishna)श्रीमद्भगवद्गीता ४.७-८
अवतार रहस्य
25 Sep 2026

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते। सङ्गात्सञ्जायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

इंद्रिय-विषयों का निरंतर चिंतन करने से मनुष्य की उनमें आसक्ति हो जाती है। आसक्ति से तीव्र कामना उत्पन्न होती है, और कामना में बाधा पड़ने पर भयंकर क्रोध उत्पन्न होता है।

— भगवान श्रीकृष्ण (Shri Krishna)श्रीमद्भगवद्गीता २.६२
इंद्रियजय
26 Sep 2026

रामो विग्रहवान् धर्मः साधुः सत्यपराक्रमः। राजा सर्वस्य लोकस्य देवानां मघवानिव॥

श्रीराम साक्षात् धर्म के मूर्त स्वरूप हैं। वे परम साधु और सत्यवादी पराक्रमी हैं। वे सम्पूर्ण लोकों के वैसे ही रक्षक और स्वामी हैं जैसे देवताओं के देवराज इन्द्र हैं।

— भगवान श्रीराम (Lord Rama)वाल्मीकि रामायण ३.३७.१३
मर्यादा धर्म
27 Sep 2026

अपि स्वर्णमयी लङ्का न मे लक्ष्मण रोचते। जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥

हे लक्ष्मण! यद्यपि यह लंका सम्पूर्ण सुवर्ण से निर्मित है, फिर भी इसमें मेरा मन नहीं लगता। माता और जन्मभूमि का स्थान तो स्वर्ग से भी कहीं अधिक श्रेष्ठ और पूज्य है।

— भगवान श्रीराम (Lord Rama)वाल्मीकि रामायण ६.१२४.१७
मातृभूमि
28 Sep 2026

उत्साहो बलवान् आर्य नास्त्युत्साहात् परं बलम्। सोत्साहस्य हि लोकेषु न किञ्चिदपि दुर्लभम्॥

हे आर्य! उत्साह ही संसार का सबसे बड़ा बल है; उत्साह से बढ़कर कोई शक्ति नहीं होती। जिस व्यक्ति के हृदय में अदम्य उत्साह है, उसके लिए इस त्रिभुवन में कुछ भी दुर्लभ नहीं है।

— लक्ष्मण (Lakshmana)वाल्मीकि रामायण ४.१.१२१
उत्साह बल
29 Sep 2026

धर्मो हि परमो लोके धर्मे सत्यं प्रतिष्ठितम्। धर्मसंश्रितमेतच्च पितुर्वचनमुत्तमम्॥

इस संसार में धर्म ही सर्वोपरि है और धर्म की नींव सत्य पर ही स्थित है। पिता के वचन का पालन करना भी परम धर्म का ही अंग है, इसलिए मैं वनवास स्वीकार करता हूँ।

— भगवान श्रीराम (Lord Rama)वाल्मीकि रामायण २.२१.४१
सत्य निष्ठा
30 Sep 2026

रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्राण जाहुं बरु बचनु न जाई॥

रघुकुल की यह अनादिकाल से चली आ रही मर्यादा है कि भले ही प्राण चले जाएं, परंतु दिया हुआ वचन और सिद्धांत कभी भंग नहीं होना चाहिए।

— गोस्वामी तुलसीदास (Tulsidas)रामचरितमानस दोहा २८
रघुकुल रीति
1 Oct 2026

धीरज धरम मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥

धैर्य, धर्म, सच्चा मित्र और जीवनसंगिनी — इन चारों की वास्तविक परीक्षा विपत्ति और संकट के समय ही होती है।

— श्रीरामचरितमानस नीति (Ramcharitmanas)रामचरितमानस अरण्यकाण्ड
धैर्य एवं विवेक
2 Oct 2026

न भीतो मरणादस्मि केवलं दूषितो यशः। यच्च मे कीर्तयेत् कश्चित् तन्मे मरणतोऽधिकम्॥

मुझे मृत्यु का कोई भय नहीं है; मुझे केवल अपने यश और चरित्र पर कलंक लगने का भय है। क्योंकि स्वाभिमानी पुरुष के लिए अपयश मृत्यु से भी अधिक कष्टकारी होता है।

— भगवान श्रीराम (Lord Rama)वाल्मीकि रामायण २.१९.३१
कीर्ति एवं यश
3 Oct 2026

न कालो दण्डमुद्यम्य शिरः कृन्तति कस्यचित्। कालस्य बलमेतावद् विपरीतार्थदर्शनम्॥

काल (विनाशकारी समय) किसी पर हाथ में डंडा लेकर सिर काटने नहीं आता; काल का प्रभाव केवल इतना ही होता है कि वह मनुष्य की बुद्धि को भ्रष्ट कर देता है और उसे अनुचित भी उचित लगने लगता है।

— महर्षि वाल्मीकि (Maharshi Valmiki)वाल्मीकि रामायण नीति
काल विवेक
4 Oct 2026

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥

हे भारत (अर्जुन)! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म का उत्थान होता है, तब-तब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ (अवतार धारण करता हूँ)।

— भगवान श्रीकृष्ण (Shri Krishna)श्रीमद्भगवद्गीता ४.७
अवतार रहस्य
5 Oct 2026

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥

सज्जनों और धर्मात्माओं के उद्धार के लिए, दुष्ट कर्म करने वालों के विनाश के लिए, और धर्म की भली-भांति स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।

— भगवान श्रीकृष्ण (Shri Krishna)श्रीमद्भगवद्गीता ४.८
सज्जन रक्षा
6 Oct 2026

क्रोधाद्भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

क्रोध से अविवेक (सम्मोह) उत्पन्न होता है, अविवेक से स्मृति भ्रमित हो जाती है; स्मृति के भ्रमित होने से बुद्धि का नाश हो जाता है, और बुद्धि नष्ट होने पर मनुष्य स्वयं नष्ट हो जाता है।

— भगवान श्रीकृष्ण (Shri Krishna)श्रीमद्भगवद्गीता २.६३
मनोनिग्रह
7 Oct 2026

उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

मनुष्य को चाहिए कि वह अपने मन द्वारा अपना उद्धार करे, अपने आपको नीचे न गिराए। क्योंकि यह मनुष्य स्वयं ही अपना सच्चा मित्र है और स्वयं ही अपना सबसे बड़ा शत्रु है।

— भगवान श्रीकृष्ण (Shri Krishna)श्रीमद्भगवद्गीता ६.५
आत्मोद्धार
8 Oct 2026

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः। तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥

जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण (दिव्य ज्ञान व मार्गदर्शन) हैं और जहाँ धनुर्धारी पार्थ (समर्पित पुरुषार्थ व कर्म) है, वहीं अचल श्री (समृद्धि), विजय, अलौकिक शक्ति और अटल नीति है — यह मेरा निश्चित मत है।

— संजय (Sanjaya)श्रीमद्भगवद्गीता १८.७८
विजय सूत्र
9 Oct 2026

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥

सभी औपचारिक धर्मों और संशयों को छोड़कर केवल मेरी अनन्य शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें समस्त बंधनों और दुखों से मुक्त कर दूँगा; तुम शोक मत करो।

— भगवान श्रीकृष्ण (Shri Krishna)श्रीमद्भगवद्गीता १८.६६
अभय शरण
10 Oct 2026

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

हे धनञ्जय! आसक्ति को त्यागकर तथा सफलता और असफलता में समान भाव रखकर योग में स्थित होकर कर्म करो। इस समत्व (मानसिक संतुलन) को ही वास्तव में 'योग' कहा जाता है।

— भगवान श्रीकृष्ण (Shri Krishna)श्रीमद्भगवद्गीता २.४८
समत्वम्
11 Oct 2026

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥

दूसरों के धर्म (कर्तव्य) का भली-भांति आचरण करने की अपेक्षा अपना सहज स्वभावजन्य धर्म (कर्तव्य) अपूर्ण रूप से भी करना कहीं अधिक श्रेयस्कर है। अपने धर्म में मृत्यु भी कल्याणकारी है, परंतु दूसरों का धर्म भय उत्पन्न करने वाला है।

— भगवान श्रीकृष्ण (Shri Krishna)श्रीमद्भगवद्गीता ३.३५
स्वधर्म
12 Oct 2026

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी- विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि। धधद्धधद्धधज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम॥

जिनके सघन जटाजूट रूपी कड़ाह से पवित्र सुरसरि गंगा की चंचल लहरें वेगपूर्वक बहती हुई मस्तक को सुशोभित कर रही हैं, जिनके मस्तक पर धक्-धक् जलती अग्नि प्रज्वलित है और जिनके शीश पर बाल-चन्द्रमा विराजित हैं, उन देवाधिदेव महादेव में मेरा मन प्रतिक्षण अनुरक्त रहे।

— देवाधिदेव महादेव (Lord Shiva)शिव ताण्डव स्तोत्र १
शिव ताण्डव
13 Oct 2026

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥

जो कर्पूर के समान श्वेत वर्ण और करुणा के साक्षात् अवतार हैं, जो इस सम्पूर्ण संसार का मूल तत्व (सार) हैं और सर्पों का हार धारण करते हैं; जो भक्तों के हृदय-कमल में सदा निवास करते हैं, उन भगवान भव (शिव) को माता भवानी (पार्वती) सहित मैं नमन करता हूँ।

— भगवान सदाशिव (Sadashiva)कर्पूरगौरं स्तोत्र
करुणावतार
14 Oct 2026

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्यchainsोर्मुक्षीय मामृतात्॥

हम त्रिनेत्रधारी भगवान शिव की आराधना करते हैं, जो सुगन्धित हैं और समस्त जीवों का पोषण करने वाले हैं। जिस प्रकार पका हुआ खरबूजा बेल के बंधन से अनायास मुक्त हो जाता है, उसी प्रकार हम भी मृत्यु और संसार के बंधनों से मुक्त हों, पर अमृतत्व (परमपद) से कभी विलग न हों।

— त्रिनेत्रधारी महादेव (Tryambaka)ऋग्वेद ७.५९.१२
महामृत्युंजय
15 Oct 2026

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय। नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नमः शिवाय॥

जो सर्पराज का हार धारण करते हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जिनका सम्पूर्ण अंग भस्म से सुशोभित है, जो देवाधिदेव महेश्वर हैं; जो नित्य, विशुद्ध और दिशाओं को ही वस्त्र के रूप में धारण करने वाले (दिगम्बर) हैं — उस 'न' कार स्वरूप भगवान शिव को मेरा नमस्कार है।

— आदि शंकराचार्य (Adi Shankaracharya)पञ्चाक्षर स्तोत्र १
पंचाक्षर तत्व
16 Oct 2026

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्॥

मैं मुक्तिदाता ईशान (शिव) को नमन करता हूँ, जो मोक्ष स्वरूप, सर्वसमर्थ, सर्वव्यापी तथा ब्रह्म और वेद स्वरूप हैं। जो अपने स्वरूप में स्थित, समस्त गुणों से परे, निर्विकल्प, इच्छारहित, चेतना के अगाध आकाश स्वरूप और आकाश के समान व्यापक हैं, उन महेश्वर का मैं भजन करता हूँ।

— भगवान शिव (ईशान)रुद्राष्टकम् १
रुद्राष्टकम्
17 Oct 2026

असितगिरिसमं स्यात् कज्जलं सिन्धुपात्रे सुरतरुवरशाखा लेखनी पत्रमुर्वी। लिखति यदि गृहीत्वा शारदा सर्वकालं tad api तव गुणानामीश पारं न याति॥

यदि नील पर्वत के समान स्याही का ढेर हो, समुद्र रूपी दवात हो, कल्पवृक्ष की शाखा की लेखनी हो, सम्पूर्ण पृथ्वी कागज हो और स्वयं साक्षात् सरस्वती अनंत काल तक लिखती रहें, तब भी हे ईश! आपके दिव्य गुणों का पार नहीं पाया जा सकता।

— गन्धर्वराज पुष्पदन्त (Pushpadanta)शिवमहिम्न स्तोत्र ३२
शिवमहिम्न
18 Oct 2026

शान्तं पद्मासनस्थं शशधरमुकुटं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रं शूलं वज्रं च खड्गं परशुमभयदं दक्षिणाङ्गे वहन्तम्। नागं पाशं च घण्टां डमरुकसहितां चाङ्कुशं वामभागे सर्वालङ्कारयुक्तं प्रणमत सततं चन्द्रचूडं भवानीम्॥

जो परम शांत, पद्मासन पर स्थित, चन्द्रमा का मुकुट धारण करने वाले, पंचमुख और त्रिनेत्र हैं; जो अपने दाहिने हाथों में शूल, वज्र, खड्ग, परशु और अभयमुद्रा धारण करते हैं और बाएँ हाथों में नाग, पाश, घण्टा, डमरू तथा अंकुश धारण करते हैं — उन चन्द्रशेखर भगवान शिव को सतत प्रणाम करें।

— देवाधिदेव महादेव (Lord Shiva)शिव पुराण ध्यान श्लोक
शिव ध्यानम्
19 Oct 2026

विषं विषधरैः सार्धं कण्ठे यस्य विभूषणम्। अमृतं यस्य संस्पर्शात् स शिवः पातु नः सदा॥

हलाहल विष भी सर्पों के साथ जिनके कंठ में आभूषण बन जाता है, और जिनके स्पर्श मात्र से विष भी अमृत में परिवर्तित हो जाता है — वे कल्याणकारी भगवान शिव सदा हमारी रक्षा करें।

— भगवान नीलकण्ठ (Neelakantha)स्कन्द पुराण नीलकण्ठ स्तव
नीलकण्ठ
20 Oct 2026

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥

जिनकी गति मन के समान और वेग वायु के समान तीव्र है, जिन्होंने अपनी समस्त इंद्रियों पर पूर्ण विजय प्राप्त कर ली है, जो बुद्धिमानों में सर्वश्रेष्ठ हैं; जो पवन-पुत्र और वानर सेना के अग्रगण्य हैं, उन परम प्रभु श्रीराम के दूत श्रीहनुमान जी की मैं शरण लेता हूँ।

— श्रीहनुमान (Lord Hanuman)रामरक्षा स्तोत्र ३३
मनोजवम्
21 Oct 2026

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥

जो अतुल्य बल के धाम हैं, जिनका सुवर्ण पर्वत (सुमेरु) के समान कांतिमान देह है, जो दुष्ट राक्षसों रूपी वन के लिए प्रलयंकारी अग्नि हैं, जो ज्ञानियों में सबसे आगे गिने जाते हैं; जो समस्त सद्गुणों के भंडार हैं और भगवान श्रीराम के परम प्रिय भक्त हैं, उन पवन-पुत्र हनुमान को मैं नमन करता हूँ।

— श्रीहनुमान (Lord Hanuman)सुन्दरकाण्ड मंगलाचरण श्लोक ३
अतुलित बल
22 Oct 2026

कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होई तात तुम्ह पाहीं॥

हे तात! इस संसार में ऐसा कौन सा कठिन से कठिन कार्य है, जो आपके द्वारा संपन्न न हो सके? (आप सब कुछ कर सकते हैं, केवल अपनी शक्ति को पहचानें!)

— ऋक्षराज जामवन्त (Jambavan)रामचरितमानस चौपाई २९
शक्ति जागरण
23 Oct 2026

बुद्धिर्बलं यशो धैर्यं निर्भयत्वमरोगता। अजाड्यं वाक्पटुत्वं च हनुमत्स्मरणाद् भवेत्॥

श्रीहनुमान जी के स्मरण और आदर्शों पर चलने से बुद्धि, शारीरिक व आत्मिक बल, उज्ज्वल यश, अचल धैर्य, निर्भयता, उत्तम स्वास्थ्य, कर्मठता (आलस्य का अभाव) और प्रभावी वाक्पटुता प्राप्त होती है।

— श्रीहनुमान (Lord Hanuman)हनुमत् स्मरण स्तोत्र १
निर्भयता
24 Oct 2026

भूत पिसाच निकट नहिं आवै। महाबीर जब नाम सुनावै॥ नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा॥

महावीर हनुमान का नाम स्मरण करने मात्र से नकारात्मक शक्तियां, भ्रम और भय निकट नहीं आते। महावीर का निरंतर ध्यान करने से समस्त शारीरिक व मानसिक रोग और पीड़ाएं नष्ट हो जाती हैं।

— गोस्वामी तुलसीदास (Hanuman Chalisa)हनुमान चालीसा २४-२५
सङ्कटमोचन
25 Oct 2026

जिन्ह के कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह के हृदय बसहु रघुराया॥

जिनके हृदय में कोई कपट, पाखंड और छल-प्रपंच नहीं होता, साक्षात् रघुपति श्रीराम केवल उन्हीं के निष्कपट हृदय में वास करते हैं।

— महर्षि वाल्मीकि (Valmiki to Rama)रामचरितमानस अयोध्याकाण्ड
निष्कपट भक्ति
26 Sep 2026

प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानघन। जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥

मैं पवन-पुत्र हनुमान जी को प्रणाम करता हूँ, जो दुष्टों रूपी वन के लिए अग्नि समान हैं, जो ज्ञान के अगाध मेघ (घन) हैं, और जिनके हृदय रूपी मंदिर में धनुष-बाण धारण किए साक्षात् भगवान श्रीराम सदा निवास करते हैं।

— श्रीहनुमान (Lord Hanuman)सुन्दरकाण्ड श्लोक ४
ज्ञानघन
27 Sep 2026

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। बिकट रूप धरि लंक जरावा॥ भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्र के काज संवारे॥

माता सीता के समक्ष आप अत्यंत विनीत सूक्ष्म रूप में प्रकट हुए, लंका में अहंकारी रावण के समक्ष विकराल रूप धारण कर लंका को भस्म किया, और युद्ध में विशाल भीम रूप धारण कर दुष्टों का संहार कर श्रीराम के समस्त कार्यों को सिद्ध किया।

— श्रीहनुमान (Lord Hanuman)हनुमान चालीसा ९-१०
विविध रूप